बौद्ध धर्म का इतिहास | History of Buddhism

आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको जानकारी देने वाले है कि बौद्ध धर्म का इतिहास, बौद्ध धर्म का जीवन परिचय और बुद्ध की जीवनी, बुद्ध की जीवनी का प्रथम चरण यानी जन्म से लेकर 29 वे वर्ष तक का विवरण, बुद्ध की जीवनी का द्वितीय चरण उम्र के 29 वे वर्ष से 35 वे वर्ष के दौर की घटना, बुद्ध के जीवन का तृतीय चरण उम्र के 35 वर्ष से अंतिम दौर तक और अंतिम में बौद्ध धर्म का इतिहास से जुड़े FAQS।

तो चलिए आपका ज्यादा समय न लएते हुए हम अपने आर्टिकल को शुरू करते है और आपको जंकारिक देते है बौद्ध धर्म का इतिहास के बारे में,

History of Buddhism

बौद्ध धर्म का जीवन परिचय और बुद्ध की जीवनी | बौद्ध धर्म का इतिहास (History of Buddhism)

  • बुद्ध की जीवनी बनाने में मुख्य रूप से दो व्यवधान उभरकर सामने आता है। बुद्ध को इस संसार में मानव, महामानव से बढ़कर देवता मानते हैं। जब कोई व्यक्ति मानव से बढ़कर महामानव की श्रेणी में आ जाता है, तो बहुत सारे किवंदतीय (दंतकथा) आने लगती हैं लोक जीवन में, बुद्ध की जीवनी तैयार करने में इतिहासकारों के बीच यही एक बहुत बड़ी समस्या रही है। 
  • क्योंकि बौद्ध धर्म का फैलाव विस्तार भारत के बाहर भी अन्य देशों में हुआ, जैसे :- चीन, नेपाल, वर्मा, श्रीलंका, जापान, तिब्बत, कोरिया इत्यादि। इसलिए बुद्ध के जीवन का मामला एक देश से ना जुड़ कर कई देशों से जुड़ा रहा और सभी देशों में बुद्ध के जीवन चरित्र को कहानियों के माध्यम से अलग अलग तरीके से पेश किया गया। इस कारण बुद्ध की एक समान जीवनी तैयार करने में समस्या होती है, लेकिन भारतीय इतिहासकारों में समस्त तिथि चीनी परंपरा, चीन देश से लेकर तथा समस्त घटनाएं जो अलग-अलग देशों की परंपरा में है दोनों के बीच सामंजस्य बैठाकर बुद्ध की जीवनी तैयार किए है। 

बुद्ध की जीवनी का प्रथम चरण यानी जन्म से लेकर 29 वे वर्ष तक का विवरण | बौद्ध धर्म का इतिहास (History of Buddhism)

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में कई छोटे-छोटे गणराज्य थे। जैसे – शक्यगण (कपिलवस्तु), कोलिय गण (देवदत / रामग्राम), कुलीय गण (अलवक)। इस समय शाक्य गन का राजा शुद्धोधन था, जिसका विवाह खोलिए गण के राजा अर्जन की पुत्री महामाया से हुआ था। 

Note – महामाया की मृत्यु के बाद इसका विवाह अर्जन की दूसरी पुत्री महाप्रजापति से हुआ। 

महामाया जिस समय गर्भवती थी उन्हे एक रात स्वप्न आया कि उन्हें हिमालय क्षेत्र ले जाया जा रहा है अन्वप्त झील की ओर, जब वे अन्वप्त झील के पास पहुंची तो वह देखती हैं कि ढेर सारे सफेद हाथी अपने सूंड में कमल के फूल को लेकर उनका स्वागत कर रहे हैं।

जब उन्होंने यह घटना शुद्धोधन को बताई तब उन्होंने ज्योतिषियों को दरबार में बुलाया जब ज्योतिषी दरबार में आए तो ज्योतिषियों ने यह सुझाव दिया कि इस गर्भ में पल रहा बालक विशिष्ट है। तब महामाया कि कपिलवस्तु से देवदत्त जाने की तैयारी शुरू हुई,

कपिलवस्तु से कुछ ही दूरी पर रुममिनदेव जगह पर लुंबिनी वन के निकट शाक्य गन, शाल वृक्ष के नीचे महामाया ने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम “सिद्धार्थ” रखा गया, चीनी परंपरा के अनुसार इनकी जन्मतिथि 563 ईसवी पूर्व निर्धारित किया गया। 

जन्म के बाद शुद्धोधन अपने पुत्र का भविष्य बनाने के लिए तीस ज्योतिषियों को राज दरबार में बुलाते है जिसमें सबसे प्रसिद्ध ज्योतिष काल देवल थे, जिन्होंने बालक को देखा, प्रणाम किया और रोने लगे।

प्रणाम इसलिए किया कि वह विशिष्ट बालक थे और रोने इसलिए लगे कि जब तक उनकी विशिष्टता इस धरती पर आएगी तब तक यह इस धरती पर नहीं रहेंगे। 

वहीं दूसरे सबसे प्रसिद्ध ज्योतिष कौंडिण्य मानवन थे, जिन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि इस बालक का पैर घर में बहुत दिनों तक नहीं टिकेगा जिस दिन यह बालक चार चिन्हों (वृद्धा, रोगी, मृत्य, सन्यासी) को देख लेगा उसी दिन यह घर छोड़ देगा।

यह सभी बात सुनकर शुद्धोधन को लगा की भविष्यवाणी गलत है और अगर यह गलत नहीं भी है तो इसे झुठला दिया जाएगा, गलत कर दिया जाएगा। ज्योतिषियों ने इन्हें जिन चार चिन्हों का दर्शन एक साथ करने की बात कही है हम उसे कभी भी नहीं करने देंगे

इसलिए इनकी (सिद्धार्थ) पढ़ाई लिखाई की सभी व्यवस्था घर पर ही कर दी गई जिसकी चर्चा बौद्ध धर्म में मिलती है धीरे-धीरे समय बीतता गए और लोगों को लगने लगा कि भविष्यवाणी गलत हो गई

और शुद्धोधन भी भविष्यवाणी को भूल गए और इसका विवाह कोलिए गण के यशोधरा से कर दिया बौद्ध साहित्य में इनकी पत्नी के लिए सबसे प्रसिद्ध नाम यशोधरा के अलावा बिंबा, गोधा और मच्छ कच्छा का नाम आया है , यह सब एक ही पात्र का नाम है लेकिन अलग-अलग साहित्य में अलग-अलग नाम आया है। 

धीरे-धीरे सिद्धार्थ गृहस्थ जीवन में रम गए और सुखों का समस्त प्रबंध इनके लिए घर में ही कर दिया गया जिसके कारण सिद्धार्थ को कभी बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ी

लेकिन अब सिद्धार्थ अपने उम्र के 29 वर्ष में पहुंच गए इस समय शुद्धोधन बुढापा में प्रवेश कर गए थे इसलिए वह अपने पुत्र के सामने भी नहीं आते थे कि कहीं उन्हें देखकर सिद्धार्थ घर न छोड़ दें। 

बुद्ध की जीवनी का द्वितीय चरण उम्र के 29 वे वर्ष से 35 वे वर्ष के दौर की घटना | बौद्ध धर्म का इतिहास (History of Buddhism)

सिद्धार्थ अब उम्र के 29 वे वर्ष में प्रवेश कर चुके थे और पिता पूरी तरह से निश्चिंत थे कि सिद्धार्थ गृहस्थ जीवन में पूरी तरह से रम गया है और अब यह घर नहीं छोड़ेगा

लेकिन एक दिन सिद्धार्थ कपिलवस्तु घूमने की इच्छा व्यक्त करते हैं और घूमने के क्रम में ज्योतिषियों ने जिन चार चिन्हों का दर्शन एक साथ करने की बात कही थी सिद्धार्थ ने उन तीन चिन्हों का दर्शन एक साथ कर लिया जिसमे उनके सामने वृद्ध, रोगी और मृत्य आए,

वे उन्हें देखकर काफी चिंतित हो गए और थोड़ा आगे जाने पर उन्होंने चौथे चिन्ह यानि सन्यासी को भी देख लिया सन्यासी को देखकर यह काफी खुश हो गए इसी दौरान इन्हें पुत्र रत्न की भी प्राप्ति का समाचार मिला जिसका नाम इन्होंने ‘राहुल’ यानी “एक और बंधन उत्पन्न हो जाना” रखा

कपिलवस्तु से भ्रमण के दौरान ही एक सेठ और उसकी कन्या के बीच झगड़े (उपसाह) के बातों को सुना (कृष्णा गौतमी संवाद कहलाया) ऐसी कुछ घटनाओं के बाद सिद्धार्थ का गृहस्थ जीवन से पूरी तरह मोह भंग हो गया

और उन्होंने निर्णय लिया कि वह गृह त्याग करेंगे उन्होंने मध्य रात्रि को ही अपने प्रधान सेवक (चन्ना) को कहा कि मेरे लिए अश्वराज को कंथक (तैयार) कीजिए मैं घर से बाहर जाना चाहता हूं,

चन्ना उनके लिए अश्वराज को तैयार किया और सिद्धार्थ अपने उम्र के 29 वे वर्ष में वैशाख पूर्णिमा की रात्रि को सदा सर्वदा के लिए घर को त्याग दिया जिसे बौद्ध साहित्य में महाभिनिष्क्रमण कहां गया,

महाभिनिष्क्रमण का प्रतीक बना एक घोड़ा जिसका इस्तेमाल कारके सिद्धार्थ ने एक ही रात में 3 गण की सीमा को पार कर लिया (शाक्य गण, कोलिय गण और कुलिय गण) और पहुंच गए ओमी नदी (अनोमा नदी) के तट पर जो गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में है।

यहीं पर उन्होंने अपने लंबे लंबे बालों को काटकर, समस्त आभूषण को उतारकर नदी में फेंक दिया और घोषणा कर दिया कि मैंने प्रवज्या (सन्यास) ले लिया। छंदक को वापस लौट जाने को कहा, जिसके कारण छंदक रोते हुए वापस लौट गया। 

एवं उसके बाद 144 हाथ चौरी यानी 8 ऋषभ ओमी (अनोमा) नदी को पार किया और यह कहे कि जिस तरह यह नदी बड़ी है इसी तरह मेरी प्रवज्या, मेरी प्रसिद्धि भी एक दिन बड़ी होगी। 

उम्र के 29 वे वर्ष से 35 वे वर्ष तक सिद्धार्थ सर्वोच्च ज्ञान की खोज में जैसे जीवन क्या है, मृत्यु क्यों, संसार क्या है, जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है इत्यादि की खोज में भटकते रहे

इसी क्रम में उन्हें दो गुरु से मुलाकात हुई जिसमें पहले गुरु थे अलार कलाम जो वैशाली के रहने वाले थे इनसे सिद्धार्थ ने प्रारंभिक शिक्षा ली अलार कलाम ने सिद्धार्थ को प्रभावित किया लेकिन सिद्धार्थ इनसे भी पूर्ण संतुष्ट नहीं हुए

वही सिद्धार्थ के दूसरे गुरु के रूप में उद्रकराम पुत्र (रूद्र कराम पुत्र) की चर्चा है, जिससे उन्होंने योग की शिक्षा ली। 

वही गया के आस पास सिद्धार्थ की मुलाकात पांच भिक्षुओं से हुई थी

  • अश्वजीत
  • वाप्त
  • भतीय
  • कौंडिन्य
  • महाना

सिद्धार्थ इनके साथ रह कर लंबे समय तक उपवास किए, इससे इन्हें कोई फायदा नहीं हुआ और वह बोले यह कोई ज्ञान की प्राप्ति नहीं है उपवास की प्रक्रिया में उन्होंने यह पाया कि शरीर को अधिक कष्ट होता है तब फिर वे बोलोए कि शरीर को अधिक कष्ट देने से बेहतर ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। 

बुद्ध, बौद्ध साहित्य मझिम निकाय में बुद्ध बताते हैं कि इन 5 भिक्षुओं के संपर्क में आने के बाद मेरी शारीरिक स्थिति काफी खराब हो गई थी, इसलिए मैंने उनका साथ छोड़ दिया और साथ छोड़ने पर इन 5 भिक्षुओं ने मेरा बहुत मजाक उड़ाया था। 

वर्तमान बिहार के मगध महाजनपद के उरुवेला (गया के निकट) बोधगया के निकट मूँडेसरी पर्वत के निकट, निरंजना नदी के तट पर (फल्गु नदी/लीला जन नदी) कभी वज्रासन की मुद्रा में, तो कभी पद्मासन की मुद्रा में, कभी पीपल वृक्ष के नीचे, तो कभी बरगद वृक्ष के नीचे (पीपल वृक्ष को बौद्ध साहित्य में बोधिवृक्ष या अस्वथ वृक्ष तथा बरगद वृक्ष को निग्रोटी वृक्ष कहा गया)

कभी वर्षा से लड़ते हुए, इंद्र से लड़ते हुए तथा कभी-कभी काम से लड़ते हुए, कभी-कभी मुच्छकिंद नाग द्वारा रक्षित होते हुए कुल दिन-रात के सात कर्म में 49 दिन की तपस्या के बाद वैशाख पूर्णिमा को पीपल वृक्ष के नीचे वज्रासन की मुद्रा में बैठे सिद्धार्थ को सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई। 

सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त सिद्धार्थ जो सत्य और सत्य के तथ्य तक पहुंच गए वहीं वे तथागत कहलाए, सर्वोच्च ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ को ही “बुद्ध” कहा गया। 

बुद्ध के जीवन का तृतीय चरण उम्र के 35 वर्ष से अंतिम दौर तक | बौद्ध धर्म का इतिहास (History of Buddhism)

महावग्ग के अनुसार उरुवेला में ही बुद्ध ने तपस्सु एवं मलिक को प्रथम उपदेश दिए जबकि अन्य बौद्ध साहित्य (दिग्ध निकाय) का मानना है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ/बुद्ध/तथागत/अनंता ऋषि पतन (सारनाथ) पहुंचे

ऋषि पतन को भी बौद्ध साहित्य में सारनाथ/मृगदाऊ/हिरण्य कुंज/हिरण्य पार्क/डियर पार्क कहां गया यहीं पर उन्होंने उन 5 भिक्षुओं को संबोधित किया जो कभी बुद्ध का मजाक उड़ाए थे

बुद्ध के प्रथम धर्मों उपदेश को “धर्म चक्र प्रवर्तन” कहा गया और इसका प्रतीक चिन्ह चक्र बना। 

  • प्रथम धर्म चक्र प्रवर्तन सारनाथ/ऋषि पतन/डियर पार्क में हुआ। 
  • दूसरा धर्म चक्र प्रवर्तन रत्नागिरी, गिद्ध कुंड पर्वत में हुआ। 
  • तीसरा धर्म चक्र प्रवर्तन धान्य कटक में हुआ। 

बुद्ध सारनाथ में ही रहते हुए वाराणसी के प्रसिद्ध श्रेष्ठी के पुत्र यश को अपना शिष्य बनाया, इसके साथ ही व्यापारी वर्ग में भी बुद्ध के उपदेश/विचार का प्रसार होना शुरू हो गया।

बुद्ध ने उम्र के 35 से 80 वर्ष तक लगभग 45 वर्ष अपने विचार/धर्म प्रचार का प्रमुख केंद्र बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल तराई क्षेत्र को बनाया

इन समस्त क्षेत्रों में जहां-जहां बुद्ध गए उनके विचारों को लोगों ने तेजी से ग्रहण किया और बुद्ध का भव्य स्वागत किया बुद्ध धर्म प्रचार के दौरान जहां जहां रुके वहां स्थाई निवास, प्रवचन स्थल बनाया गया जिसे बौद्ध साहित्य में आराम या विहार कहा गया। 

वर्षा काल में लगभग 4 महीने जहां बुद्ध भिक्षु समाधि लगाते थे ऐसे स्थल को बासा या आश्रम कहा जाता था।

बुद्ध ने अपने जीवन काल में 75% प्रवचन उपदेश श्रावस्ती के जेतवन विहार में दिए थे।

बौद्ध धर्म का इतिहास FAQ :-

Q. बौद्ध धर्म की शुरुआत कैसे हुई?

जब 483 ईसा पूर्व के आसपास सिद्धार्थ (बुद्ध) का निधन हो गया तब, उनके अनुयायियों द्वारा एक आंदोलन चलाया गया। जिससे की बुद्ध की शिक्षाएं बौद्ध धर्म के विकसित होने की एक सबसे बड़ी नीव बन गई। तब तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व, मौर्य भारतीय सम्राट अशोक महान ने बौद्ध धर्म को भारत के राज्य धर्म का दर्जा दिया।

Q. क्या बुद्ध से पहले भी बौद्ध धर्म था?

नहीं, पूर्व सांप्रदायिक बौद्ध धर्म, जिसे बौद्ध धर्म भी कहा जाता है उसे बुद्ध द्वारा ही शुरू किया गया था।

Q. दुनिया का सबसे पहला धर्म कौन सा है?

दुनिया का सबसे पहला धर्म हिंदू धर्म था, जिसके अनुयायी भारत, नेपाल और मॉरीशस में बहुत अधिक मात्रा में थे।

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